अब डर लगता है

तुम्हें देखता हूँ तो अच्छा लगता है तुमसे बातें करता हूँ तो अच्छा लगता है तुम्हें हँसते हुए देखता हूँ तो और अच्छा लगता है पर इस अच्छे लगने वाले ख्याल के ज़हन में आते ही अब डर लगता है। तुम नज़दीक नहीं होती तो अच्छा नहीं लगता तुम किसी और के करीब होती हो... Continue Reading →

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खिड़कियाँ

आज यूँ ही कॉलेज की खिड़की से बाहर देख रहा था  तो ख्याल आया कि बीस सालों से ना जाने कितनी खिडकियों के पार देखा होगा मैंने कुछ बंद भी थी शायद पर फिर भी कितनी ही खिड़कियाँ हैं ज़हन में मेरे। मेरी माँ के कमरे की खिड़की जिसके दरवाज़े से  सुबह सुबह उठते ही... Continue Reading →

A letter to Rishikesh 

You're like my father to me.  I admire my father, more than anyone else. All my friends know it. I always talk about him in public. I tell people how much I love my father, how much I adore him, want to be like him, and.. how much I love him. But you know, what? I never tell any of these things to him. You know, I just cannot and  neither can other sons, I guess. This is weird yet true. 

एक किताब जैसी थी वो।

एक किताब जैसी थी वो। रंगीन जिल्द में सजी एक सफ़ेद झूठों से भरी किताब। नाम बताना तो मुनासिब भी नहीं उसका, और याद भी नहीं अब मुझे। बस याद है तो वो खुशबू  जो पहले पन्ने को खोलकर आई थी। वो महकते अल्फाज़ और उनकी बनावट याद है। एक चमकते शीशे के बर्तन में... Continue Reading →

नाच।

जिसके लिए किताबें बेचकर शराब खरीदी और रोज़ बेहोश होने तक पिलाई जिसे अपने कन्धों पर उठाया और अपने बिस्तर पर सुलाया जिसे नालियों में गिरने से रोका और जाने कितने झगड़ो से बचाया और तो और कई दफा जिसकी उल्टियाँ साफ़ की आज पैरों के आगे बोतल तोड़कर कहता है नाच।

इतना मसरूफ है वो..

इतना मसरूफ है वो मंजिलों के पार जाने में, के मुझको मरना पड़ेगा, उसे अपनी याद दिलाने में। वो ले रहा है ज़माने के तमाशों का मज़ा और मैं बेताब हूँ खुदको एक तमाशा बनाने में। कभी रिवाजों का खौफ़ कभी ज़माने का डर बड़ा शातिर है वो झूठे बहाने बनाने में। हैं बद्नसीब वो... Continue Reading →

वो बस पत्थर ही था

मिट्टी के ढेर से उठाकर लाया था उसे मैं बड़े बुरे हालात में था वो तब अपने हाथों से तराश कर बनाया मैंने उसे और रख दिया मंदिर में बनाया सजाया सवारा और रखा खुद से ऊपर दिन गुज़रे और साल  वो कुछ ना बोला वो पत्थर था और पत्थर ही रहा, कम्बख्त। फिर भी... Continue Reading →

And That’s how I learned poetry 

Following her steps, I walked On ice and on lava.  Frozen for a second, melting for another. Freezing, melting, breaking Dying, loving, living. My feet were dead My words were dry Life evaporated through my pores. And I gleamed with golden tears.   The sky used to be grey then, grey like ashes And purple... Continue Reading →

The best part of a heartbreak

First thing first, there’s nothing insane about using “best” and “heartbreak” in a single title. Heartbreak. Your most personal, most disturbing, most destroying phase of life. You’re dead inside. You’re clutching your room’s darkness and keeping every window shut. A day passes, two days, a week and you're still same. You feel lifeless, your eyes... Continue Reading →

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