रुकिए, याद करता हूँ

आप मुझसे कहते हैं मैं बदल गया हूँ  पर कसम मुझे मेरी मैं बदला ज़रा भी नहीं आप से मुझे पहचानने में थोड़ी गलती हुई पर यकीन मानिए  इसमें आपकी ख़ता ज़रा भी नहीं  दरअसल मैं थोड़ा भूल गया हूँ वक़्त की खुरदुरी धूल मेरी याददाश्त पर चढ़ गयी है मैं क्या क्या बन चुका... Continue Reading →

वो झुक गए

वो जो नहीं थकेदिन भर धूप में क्रिकेट खेल केबाग़ में आम तोड़ केबहन या पड़ोसियों की शादी में काम करकेवो जो नहीं डरेमाँ या मास्टर की डांट सेप्रेमिका के भाई सेसांप, बिच्छू या तिलचट्टे सेवो जो बेख़ौफ़ लड़ पड़ेदुसरे स्कूल के लड़कों सेबहन को तंग करने वाले छिछोरों सेबाप को गाली देते दुकानदार सेवो... Continue Reading →

बारिश, हरिहरण और यादें

यादें और याददाश्त दोनों अजीब चीजें हैं। कल घर आकर गाड़ी की चाबी कहाँ रखी थी, दस बार सोचने पर भी याद नहीं आता। आज से दस साल पहले स्कूल में किस मास्टर ने क्या सवल पूछा था, क्या जवाब दिया था, सारा किस्सा हू-ब-हू याद है। ठीक इसी तरह किसी चीज को कितना चाहो,... Continue Reading →

“I’m coming”, I say.

It's a sunny day. Not a scorching heat kind of sunny day, but I suppose a warm sunny day of winters. I’m sitting by my window. It is a new home that I haven’t seen before. The surroundings and the design of the nearby buildings, however, tell me that it is a Bengali neighbourhood. There... Continue Reading →

आज बदल दी

बहुत दिनों बाद आज बिस्तर की चादर बदल दी  कमरे में कांच के टुकड़े फैले थे,आज समेट दिए जो पाँव में चुभा था, उसका ज़ख्म अभी भरा नहीं है पर भर जाएगा  आज शराब की सारी बोतलें आज बेच दी बदले में आये पैसों की आइस-क्रीम खा ली  आज बहुत दिनों बाद कमरे की खिड़की... Continue Reading →

तुम कविताएँ नहीं पढ़ते 

तुम बड़ी गाड़ी में सफ़र करते हो  स्टीयरिंग व्हील पर हाथ रखते हो तो तुम्हारी कलाई की चमचमाती घड़ी  तेज़ चलता हुआ वक़्त दिखाती है  तुम्हारी कार तुमसे बात करती है  तुम्हारी घड़ी तुमसे बात करती है  तुम सब मशीनों की सुनते हो पर अपने दिल की नहीं सुनते  जानते हो क्यों? क्योंकि तुम कविताएँ... Continue Reading →

मैं सोचता हूँ अब जो उस शहर जाऊँगा

मैं सोचता हूँ अब जो उस शहर जाऊँगा तो क्या देखूँगा, क्या खोजूँगा, क्या मैं पाऊंगा? क्या अब भी मुझे लेने वो स्टेशन आएगी? क्या अब भी मुझे देख कर वो मुस्कुराएगी? क्या अब भी उसे भीड़ में खड़ा पाऊँगा? मैं क्या देखूँगा, क्या खोजूँगा, क्या मैं पाऊंगा? क्या अब भी उसके कान में होंगी... Continue Reading →

कब तक? – हमेशा के बाद तक 

“हमें बस इतना कहना है, कि अब हमारा इंतज़ार मत करना" “...” “हम मजाक नहीं कर रहे, अमन” “जानता हूँ!” “तो मुस्कुरा क्यों रहे हो? नाराज़ हो?” “...” “नाराज़ हो लो, पर ऐसे मुस्कुरा के मत देखो" “...” “कुछ तो बोलो" “दिल के मेरे पास हो कितनी, फिर भी हो कितनी दूर तुम मुझसे, मैं... Continue Reading →

तराजू

बड़े बड़े सच बड़ी बड़ी बातें पच्चीस सालों का अनुभव सैकड़ों किताबों का ज्ञान लाखों सालों का मानव विकास तुम्हें समझने की समझ सारी अक्ल, सारा विवेक, सारी होशियारी, सारी तैयारी सब का सब एक तरफ और दूसरी तरफ इतना सा सच कि तुमने मुझे नहीं चुना अब बताओ मैं किस तरफ झुक रहा हूँ?... Continue Reading →

वक़्त की रफ्तार

जैसे बहुत तेज़ दौड़ने के बाद साँसें तेज़ हो जाती हैंदिल फटने की हालत में हो आता हैशरीर पसीना-पसीना और साँसें गर्म हो जाती हैंआँखों के आगे एक हल्का धुंधलका छा जाता हैपैर सुन्न होकर डगमगाने लगते हैंफिर भी मंजिल की ओर घसीटे जाते हैंधीरे धीरे, थके हुए ठीक वैसा ही मेरा वक़्त है अबतुम्हारे... Continue Reading →

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